काल चक्र
यह पूरा संसार काल चक्र के घेरे में है, यहाँ कुछ भी कायम नहीं, कुछ भी स्थिर नहीं कुछ भी शाश्वत नहीं - ना सत्ता, ना संपत्ति ना शरीर ना सम्बन्ध ना स्वास्थ्य न रोग न शोक न आनन्द न प्रेम न धृणा न करुणा न भोग न भूख, न युवानी न वृद्धत्व न मृत्यु न दुःख न सुख - काल (समय) का पहिया हमेशा अपने साथ सब कुछ बहा के ले जाता है और मनुष्य कुछ भी नहीं कर शकता, बस खाली का खाली रह जाता है I
जो जन्मा है वो मरेगा जो बालक है वो युवा होगा जो युवा है वॉ वृद्ध होगा और जो वृद्ध है वो मृत्यु को प्राप्त हॉगा और जो मरेगा वो दूसरा जन्म लेगा -
और इसी लिए आप कितने भी प्रयत्न कर लो आप कुछ भी पकड़ के नहीं रख शकते और वही हर मनुष्य का दुःख है, के जो कायम नहीं उसे पकड़ना और ठहराना चाहता है
किसी को कभी भी किसी भी वस्तू, व्यक्ति या पद प्रतिष्ठा का अहम् नहीं करना चाहिए क्यूँ की जो आज आपका है वो कल किसी और का हो जाएगा, जो आज है वो कल नहीं रहेगा
हम कितने लोगों को मरते हुए देखते है लेकिन हम नहीं मरेंगे यह भ्रम में रहते है, हम कितने लोगों को आमिर से गरीब बनते देखते है, फिर भी हम सब एक सत्य जो इस पुरे संसार में फैला है जो यह पूरी प्रकृति का नियम है उस से हमेशा अपनी आँखे चुराये रखते है और यही हमारी बीमारी है जो हमें हर बुरा काम करने के लिये प्रेरित करती है, और हम बार बार कर्मो का भार बढ़ाते जाते है, जब तक आत्मा कर्म बंधन के भार से मुक्त होकर हलकी नहीं होती, वो कभी इस पृथ्वी लोक से ऊपर गति नहीं कर शक्ती , और मुक्ति उसे ही कहते है की पुनः इस संसार में न आना पड़े, कोई भी माया का बंधन शेष न रह जाये और आत्मा उस अजर, अमर, अविनाशी, पूर्ण पुरुष, परम चैतन्य यानि परमात्मा के विराट में विलीन हो जाये वही मोक्ष और निर्वाण है II - (बाबा संतप्रताप)


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